केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से पूरे भारत में न्यूनतम 95 RON वाले E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल मिश्रित) की बिक्री अनिवार्य कर दी है। यह कदम कच्चे तेल आयात में कमी, CO2 उत्सर्जन घटाने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए उठाया गया है। 2023 के बाद बनी ज्यादातर गाड़ियां इससे चल सकती हैं, लेकिन पुरानी गाड़ियों में माइलेज 3-5% कम हो सकता है और कुछ पार्ट्स पर असर पड़ सकता है।
1 अप्रैल 2026 से E20 पेट्रोल अनिवार्य: पूरी जानकारी
केंद्र सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने फरवरी 2026 में अधिसूचना जारी कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तेल विपणन कंपनियों को निर्देश दिया है कि 1 अप्रैल 2026 से पेट्रोल में अधिकतम 20% एथेनॉल मिश्रित (E20) और कम से कम 95 रिसर्च ऑक्टेन नंबर (RON) वाला ईंधन ही बेचा जाए। यह पेट्रोल Bureau of Indian Standards (BIS) की स्पेसिफिकेशंस के अनुरूप होगा।
E20 पेट्रोल में 80% पेट्रोल और 20% एथेनॉल होता है। एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और अनाज से बनता है, जो नवीकरणीय स्रोत है। यह ब्लेंड पहले से कई शहरों में उपलब्ध था, लेकिन अब पूरे देश में इसे अनिवार्य कर दिया गया है।
E20 पेट्रोल की जरूरत क्यों?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। E20 ब्लेंडिंग से कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है। पिछले कुछ वर्षों में एथेनॉल ब्लेंडिंग से विदेशी मुद्रा में 1.44 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत हुई है। E20 स्तर पर यह सालाना करीब 43,000 करोड़ रुपये की बचत और 245 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की जगह लेने का अनुमान है।
पर्यावरण के लिहाज से E20 से CO2 उत्सर्जन में कमी आती है। पिछले 11 वर्षों में ब्लेंडिंग से 736 लाख मीट्रिक टन CO2 कम हुआ, जो 30 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर है। किसानों के लिए भी फायदेमंद है क्योंकि एथेनॉल उत्पादन से गन्ना और मक्का की मांग बढ़ती है। इस साल किसानों को 40,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भुगतान होने का अनुमान है।
पुराने वाहनों पर क्या असर पड़ेगा?
2023 के बाद बनी ज्यादातर कारें और दोपहिया वाहन E20 के लिए डिजाइन किए गए हैं। इनमें कोई बड़ा बदलाव नहीं चाहिए। AR AI, IOCL और SIAM की स्टडी के अनुसार इन वाहनों में एक्सीलरेशन और फ्यूल एफिशिएंसी पर कोई खास असर नहीं पड़ता।
2012-2023 के बीच बनी गाड़ियां ज्यादातर E10 (10% एथेनॉल) के लिए बनी हैं। इनमें E20 इस्तेमाल करने से:
माइलेज में कमी : एथेनॉल की एनर्जी वैल्यू पेट्रोल से करीब एक-तिहाई कम होती है। 20% ब्लेंड पर औसतन 3-5% माइलेज घट सकता है।
फ्यूल सिस्टम पार्ट्स : रबर होसेस, गास्केट और कुछ प्लास्टिक पार्ट्स पर इथेनॉल का करोसिव असर पड़ सकता है। लंबे समय में 20,000-30,000 किमी बाद इनकी रिप्लेसमेंट जरूरी हो सकती है।
परफॉर्मेंस : कुछ मामलों में कोल्ड स्टार्ट में दिक्कत या इंजन में लेग महसूस हो सकता है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि पुरानी गाड़ियों को फेज आउट या रेट्रोफिट करने की जरूरत नहीं है। सामान्य सर्विसिंग से वियर एंड टियर मैनेज हो सकता है। कई कंपनियां जैसे Honda (2009 से E20 कम्पेटिबल), Skoda (2020 के बाद), Renault आदि ने कहा है कि उनकी पुरानी गाड़ियां भी E20 पर चल सकती हैं और वारंटी प्रभावित नहीं होगी।
माइलेज और परफॉर्मेंस पर असर की तुलना
क्या करें वाहन मालिक?
अपनी गाड़ी का मैनुअल चेक करें या डीलर से कन्फर्म करें।
E20 इस्तेमाल जारी रखें क्योंकि विकल्प उपलब्ध नहीं होगा।
माइलेज कम लगे तो सर्विस सेंटर में फ्यूल सिस्टम चेक करवाएं।
नियमित मेंटेनेंस से ज्यादातर दिक्कतें दूर हो सकती हैं।
| वाहन प्रकार | माइलेज प्रभाव (अनुमानित) | अन्य संभावित असर | सलाह |
|---|---|---|---|
| 2023 के बाद बनी गाड़ियां | कोई खास कमी नहीं | न्यूनतम | सामान्य इस्तेमाल जारी रखें |
| 2012-2023 की गाड़ियां | 3-5% कमी | रबर पार्ट्स पर संभावित प्रभाव | नियमित सर्विसिंग, होसेस चेक |
| 2012 से पहले की गाड़ियां | 4-7% कमी तक | ज्यादा करोसिव प्रभाव संभव | पार्ट्स जल्दी बदलवाएं |
Disclaimer : यह खबर सरकारी अधिसूचना और उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है। वाहन इस्तेमाल से जुड़े फैसले व्यक्तिगत जांच के बाद लें।






