“अमेरिका ने महीनों तक भारत पर रूसी तेल आयात रोकने का दबाव बनाया, लेकिन ईरान युद्ध के महज दो हफ्तों में व्हाइट हाउस अब दुनिया से—खासकर भारत से—रूसी क्रूड खरीदने की गुहार लगा रहा है।” — ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने अमेरिकी नीति के इस यू-टर्न पर तंज कसते हुए कहा।
अमेरिका का बड़ा यू-टर्न: रूसी तेल पर सैंक्शंस में छूट
पश्चिम एशिया में ईरान के साथ चल रहे संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी और मध्य पूर्वी आपूर्ति में कमी के कारण क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ऐसे में अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 5 मार्च 2026 को भारत के लिए 30 दिनों की विशेष छूट जारी की, जिसके तहत 5 मार्च तक जहाजों पर लोडेड रूसी क्रूड की डिलीवरी और बिक्री की अनुमति दी गई। यह छूट 3 अप्रैल तक वैध है।
इसके बाद 12 मार्च को अमेरिका ने और व्यापक कदम उठाया और सभी देशों के लिए 30 दिनों (11 अप्रैल तक) की लाइसेंस जारी की, जिसमें समुद्र में फंसे रूसी क्रूड की बिक्री की अनुमति दी गई। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने इसे “संकीर्ण और अल्पकालिक” कदम बताया, जिसका मकसद वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लाना है, न कि रूस को बड़ा फायदा पहुंचाना।
इस छूट के तुरंत बाद भारतीय रिफाइनर्स ने कार्रवाई की। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), रिलायंस इंडस्ट्रीज समेत प्रमुख कंपनियों ने स्पॉट मार्केट में उपलब्ध लगभग सभी रूसी क्रूड कार्गो खरीद लिए। ब्लूमबर्ग के अनुसार, छूट मिलने के बाद भारत ने करीब 30 मिलियन बैरल रूसी तेल खरीदा। कई टैंकर, जैसे मायलो और सारा, जो पहले सिंगापुर की ओर जा रहे थे, अब भारत की ओर मुड़ गए हैं।
ईरान का तीखा हमला: अमेरिका पर दोहरे मापदंड का आरोप
ईरान ने इस स्थिति पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने X पर पोस्ट कर कहा कि अमेरिका ने पहले भारत को रूसी तेल खरीदने से रोकने के लिए दबाव बनाया और 25% टैरिफ की धमकी दी, लेकिन अब ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा संकट में फंसकर दुनिया से रूसी क्रूड खरीदने की अपील कर रहा है। उन्होंने इसे “व्हाइट हाउस की भीख” करार दिया।
अरागची ने यूरोपीय देशों पर भी निशाना साधा, कहा कि उन्होंने ईरान के खिलाफ “अवैध युद्ध” का समर्थन किया, उम्मीद थी कि अमेरिका रूस के खिलाफ उनकी मदद करेगा, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। ईरान का दावा है कि यह यू-टर्न अमेरिकी नीति की पोल खोलता है, जहां सैंक्शंस का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें आसानी से हटा लिया जाता है।
भारत की स्थिति: ऊर्जा सुरक्षा पहले
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। ईरान युद्ध से पहले रूसी क्रूड पर भारी छूट (फरवरी में 13 डॉलर तक) मिल रही थी, लेकिन अब बाजार उलट गया है और रूसी Urals क्रूड पर 4-5 डॉलर का प्रीमियम लग रहा है। फिर भी, होर्मुज स्ट्रेट की समस्या के कारण मध्य पूर्वी आपूर्ति प्रभावित होने से भारत ने इस छूट का फायदा उठाया।
भारतीय अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय हित में है और भारत किसी भी स्रोत से तेल खरीदेगा। अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत ने कभी पूरी तरह रूसी आयात बंद नहीं किया। अब यूएस ने खुद छूट देकर भारत की स्थिति को मजबूत किया है।
प्रमुख तथ्य तालिका
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| अमेरिकी छूट की तारीख | 5 मार्च 2026 (भारत के लिए), 12 मार्च 2026 (सभी देशों के लिए) |
| वैधता | 3 अप्रैल (भारत), 11 अप्रैल (व्यापक) तक |
| खरीद गई मात्रा | छूट के बाद ~30 मिलियन बैरल रूसी क्रूड |
| प्रभावित जहाज | मायलो, सारा समेत कई टैंकर भारत की ओर मुड़े |
| ईरान का बयान | “व्हाइट हाउस अब भारत सहित दुनिया से रूसी क्रूड की भीख मांग रहा” |
| बाजार प्रभाव | क्रूड कीमतें 100+ डॉलर/बैरल, रूसी क्रूड अब डिस्काउंट पर नहीं |
यह घटनाक्रम वैश्विक भू-राजनीति में ऊर्जा को हथियार बनाने की रणनीति को उजागर करता है, जहां सैंक्शंस और छूट दोनों राजनीतिक जरूरतों के अनुसार बदलते रहते हैं। भारत जैसे देशों के लिए यह ऊर्जा विविधीकरण और स्वतंत्र नीति की जरूरत को और मजबूत करता है।
Disclaimer: यह खबर उपलब्ध तथ्यों और घटनाक्रम पर आधारित है।






